Description

वैशालीनामा सुदूर अतीत की पृष्ठभूमि  में ऐसी एक कथा प्रस्तुत करता है जो न केवल रोचक है बल्कि जिसमें निहित मूल्यबोध तत्कालीन देशकाल में जितना युग-परिवर्तक हो सकता था, उससे कम परिवर्तनकारी और प्रासंगिक वह आज भी नहीं है। वह मूल्यबोध है मनुष्यमात्र की समानता का। यह समानता  ऐसी किसी व्यवस्था में सम्भव नहीं हो सकती जिसका आधार स्वयं असमानता पर टिका हो। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था ही यह सम्भव कर सकती है।
वैशाली को लोकतंत्र की जन्मस्थली माना जाता है। इतिहास ही नहीं, इसके  पौराणिक सन्दर्भ भी मिलते हैं। लेखक ने इस उपन्यास के लिए एक पौराणिक आख्यान को आधार बनाया है और वर्णों के श्रेणीक्रम में विभाजित समाज की सतह के नीचे खदबदाते उस लावे पर रोशनी डाली है जो मुट्ठीभर उच्चस्थों के वर्चस्व से उत्पीड़ित अधिसंख्य जनों के क्षोभ और क्रोध से निर्मित है। स्पष्टतः यह किसी पूर्ववर्णित आख्यान का औपन्यासिक रूपान्तर मात्र नहीं है। लेखकीय कल्पना का इसमें पर्याप्त निवेश हुआ है जिसके जरिये यह कृति राजतंत्र के प्राचीन युग में समाज में व्याप्त असमानता और उसके विरुद्ध हुई प्रतिक्रिया का उल्लेख कर लोकतंत्र के आदि रूप को रेखांकित करता है और किसी ऐतिहासिकता का दावा किये बिना एक समानता पर आधारित समाज का आह्वान करता है।

About the author 

प्रभात प्रणीत

प्रभात प्रणीत का जन्म 7 अगस्त, 1977 को हाजीपुर, वैशाली (बिहार) में हुआ। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक किया है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ, कहानियाँ, लेख और समीक्षाएँ प्रकाशित होती रही हैं। वे साहित्यिक संस्था और वेव पत्रिका ‘इन्द्रधनुष’ के संस्थापक हैं। उनके दो उपन्यास— ‘यही इंतिज़ार होता’ और ‘वैशालीनामा’ तथा एक कविता-संग्रह ‘प्रश्न काल’ प्रकाशित है। वे पटना में रहते हैं।

ईमेल : prabhatpraneet@gmail.com

Additional information

Dimensions 22 × 14 × 1 cm
Binding

Paperback

ISBN

978-8119092796

Language

Hindi

Pages

216

Publication date

2023

Publisher

Radhakrishna Prakashan

Writer

Prabhat Pranit

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