Mizaj-E-Banaras : Banaras Ke Bunkar
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Mizaj-E-Banaras : Banaras Ke Bunkar By Vasanti Raman
यह किताब बनारस के बुनकरों के जीवन- जगत का एथनोग्राफिक अध्ययन है। इसमें साम्प्रदायिकता और नवउदारवादी आर्थिक नीति के परस्पर जुड़े होने और उसके बुनकरों के दिन-प्रतिदिन के जीवन से लेकर उनके कारोबार पर पड़े नकारात्मक प्रभावों का अन्वेषण किया गया है। इसमें बनारस के मिज़ाज-बनारसीपन और गंगा-जमुनी तहजीब को बनाने और बरकरार रखने में
बनारस के बुनकरों की महती भूमिका का ऐतिहासिक अवलोकन किया गया है और बताया गया है कि कैसे बुनकरों की दुनिया के संकटग्रस्त होने के साथ-साथ बनारस का मिज़ाज भी बिगड़ता चला जा रहा है। ऑफिसियल आँकड़ों और फील्ड से जुटायी गयी जानकारी के आधार पर किया गया यह शोध सामाजिक मानवविज्ञान, जेण्डर स्टडीज और दक्षिण एशिया के अध्ययन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान है।
In stock
Description
मिज़ाज-ए-बनारस
बनारस के बुनकर – वसंती रामन
Mizaj-E-Banaras : Banaras Ke Bunkar By Vasanti Raman
बनारस एक प्राचीन शहर है, जिसकी भारत में विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। वह अपने मिजाज, तौर-तरीके और आचार-व्यवहार के लिए जाना जाता है। इसकी महत्ता के कई आधार हैं- साहित्य, धर्म, हस्त उद्योग आदि।
बनारस की पहचान जिन खास चीजों से होती रही है उनमें बनारसी साड़ी भी है। लिहाजा, बनारसी साड़ी के बुनकर न सिर्फ़ इस उत्पाद के शिल्पी हैं बल्कि बनारस की अस्मिता गढ़ने में भी उनकी अहम हिस्सेदारी रही है। लेकिन सतह से नीचे जाकर देखें तो कहानी रोमाण्टिक और प्रीतिकर नहीं रह जाती। बुनकरों की उजड़ती दुनिया के सारे रेशे-धागे दीखने लगते हैं। यह किताब वसंती रामन के जमीनी शोध की देन है। खासकर नब्बे के दशक में साम्प्रदायिकता की परिघटना को समझने के मक़सद से प्रेरित इस अध्ययन का एक बड़ा आधार बुनकरी और उससे सम्बद्ध पेशों में लगे लोगों से लेखिका की बातचीत है। ये सारी बातचीत जहाँ अध्ययन को प्रामाणिक बनाती हैं वहीं रुचिकर भी। किताब इस तथ्य को रेखांकित करती चलती है कि बुनकरी में हिन्दू, मुसलमान दोनों समुदायों के साधारण लोग शामिल हैं और मुख्य रूप से पारिवारिक उद्यम से चलने वाले इस धन्धे में महिलाओं के श्रम की भी अहम भागीदारी है, भले इस बात को नजरअंदाज कर दिया जाता हो। यह अध्ययन बनारसी साड़ी की बुनकरी के सामुदायिक ताने-बाने को उजागर करने के साथ ही खासतौर से दो कड़वी हक़ीक़तों की तरफ हमारा ध्यान खींचता है। एक यह कि गंगा जमुनी तहजीब से पुष्टि पाने वाला यह उद्योग साम्प्रदायिकता की आँच में सूखता गया है। दूसरे, नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने भी बुनकरी को कहीं का नहीं छोड़ा है। क्या यही हाल और भी अनेक हस्तोद्योगों का नहीं हुआ है? यह किताब सामाजिक अध्ययन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। बनारस के बुनकर समुदाय तथा बनारसी साड़ी के उद्योग की जमीनी पड़ताल के साथ-साथ, यह बनारस को जानने-समझने के लिहाज से भी बहुत उपयोगी है।
Additional information
| Binding | Paperback |
|---|---|
| Language | Hindi |
| ISBN | 978-93-6201-857-1 |
| Pages | 360 |
| Publication date | 20-09-2024 |
| Publisher | Setu Prakashan Samuh |
| Imprint | Setu Prakashan |
| Writer | Vasanti Raman |
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