Buddhijiviyon Ki Jimmedari – RaviBhushan
Original price was: ₹550.00.₹429.00Current price is: ₹429.00.
बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी – रविभूषण
आलोचक के रूप में रविभूषण का नाम काफी जाना-पहचाना है। लेकिन बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी साहित्यिक आलोचना की किताब नहीं है। इस किताब में वह एक बुद्धिजीवी और राजनीतिक विश्लेषक के रूप में सामने आते हैं। अमूमन राजनीतिक घटनाओं पर टीका- टिप्पणी, व्याख्या और विश्लेषण पत्रकारिता का गुणधर्म माना जाता है। वह तो इस पुस्तक में भी आद्योपान्त मिलेगा लेकिन राजनीतिक यथार्थ की पड़ताल करने का उनका तरीका पत्रकारीय यानी पेशेवर तटस्थता का नहीं है। न तो वह कोउ नृप होय हमें का हानी में यकीन करते हैं। पिछले कुछ बरसों समेत भारत के वर्तमान हालात का विश्लेषण उन्होंने कुछ सरोकारों के नजरिये से किया है और वह विश्लेषण तक सीमित नहीं रहते बल्कि यह सवाल भी उठाते हैं कि इन परिस्थितियों में बौद्धिकों की भूमिका क्या होनी चाहिए। यों तो बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी का प्रश्न आधुनिक काल में हमेशा उठता रहा है लेकिन रविभूषण जिस सन्दर्भ में यह सवाल उठा रहे हैं वह 2014 के बाद का भारत है। इस भारत में ऐसी ताकतों की बन आयी है जो पूँजी व प्रचार के खेल में माहिर हैं और जो सहिष्णुता, समता, सर्वधर्म समभाव तथा नागरिक स्वतन्त्रता जैसे संवैधानिक मूल्यों और जनतान्त्रिक आधारों में यकीन नहीं करतीं। यह ऐसा समय है जब स्वतन्त्र चिन्तन और लेखन पर निरन्तर आक्रमण हो रहे हैं। सत्ता आक्रमणकारियों और उत्पीड़कों के साथ खड़ी नजर आती है। ऐसे में बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी क्या बनती है, लेखक का यह सवाल खासकर हिन्दी के लेखकों-बौद्धिकों से वास्ता रखता है क्योंकि लोकतन्त्र विरोधी प्रवृत्तियों की सबसे सघन और सक्रिय मौजूदगी हिन्दी पट्टी में है। इस किताब में भाषा, संस्कृति, धर्म से जुड़े सवाल भी हैं, पर उनके तार उस व्यापक संकट से जुड़े हैं जो प्रस्तुत पुस्तक का परिप्रेक्ष्य है। कहना न होगा कि हमारे समय के सबसे भयावह यथार्थ से टकराते हुए लेखक ने बौद्धिक साहस का परिचय दिया है।
In stock
Description
Buddhijiviyon Ki Jimmedari RaviBhushan
About the Author:
रविभूषण अपने समय और समाज के ज्वलन्त मसलों और सवालों से टकराते हैं, साथ ही राजनीति और प्रशासन के बीच व्याप्त भ्रष्टाचार और आपराधिक अवसरवाद पर गंभीर प्रशन भी खड़े करते हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। समय और समाज को केंद्र में रखकर साहित्य एवं साहित्येतर विषयों पर विपुल लेखन।
Additional information
| ISBN | 9.78939E+12 |
|---|---|
| Author | RaviBhushan |
| Binding | Paperback |
| Pages | 368 |
| Publication date | 25-02-2023 |
| Publisher | Setu Prakashan Samuh |
| Language | Hindi |
You may also like…
-
Hua Karte the Raadhe by Meena Gupta
Original price was: ₹375.00.₹292.50Current price is: ₹292.50. -
GHAR JAATE by Gulammohammed Sheikh
Original price was: ₹425.00.₹331.50Current price is: ₹331.50. -
Durgawati : Garha Ki Parakrami Rani
Original price was: ₹380.00.₹296.40Current price is: ₹296.40. -
Sabhyata Ke Kone By Ramachandra Guha
Original price was: ₹649.00.₹506.22Current price is: ₹506.22. -
RACHANA PRAKRIYA KE PADAV (Thought on Theatre Work) by Devendra Raj Ankur
Original price was: ₹499.00.₹389.22Current price is: ₹389.22. -
Bharat Se Kaise Gaya Buddh Ka Dharm By Chandrabhushan
Original price was: ₹449.00.₹350.00Current price is: ₹350.00. -
Khoye Hue Logon Ka Shahar By Ashok Bhaumik
Original price was: ₹225.00.₹175.50Current price is: ₹175.50. -
Vaishvik Aatankawad Aur Bharat Ki Asmita By Ram Puniyani
Original price was: ₹399.00.₹311.22Current price is: ₹311.22. -
Emergency Raj Ki Antarkatha By Anand Kumar
Original price was: ₹275.00.₹214.50Current price is: ₹214.50. -
Jinna : Unki Safaltayein, Vifaltayein Aur Itihas Me Unki Bhoomika by Ishtiaq Ahmed
Original price was: ₹700.00.₹546.00Current price is: ₹546.00. -
Muktibodh Ki Jeevani Combo Set – (2 Khand) – paperback
Original price was: ₹1,500.00.₹1,170.00Current price is: ₹1,170.00.



Reviews
There are no reviews yet.