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Lau

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इस कहानी में केवल आग नहीं, बहुत सारा पानी भी है, जो सारी आँच अपने सीने में जब्त कर लेता है। धुएँ और राख की, पानी और आग की यह कहानी मुझे नींद और जाग की देहरी पर मिली थी मेरी भाषा का द्वार खटखटाते हुए, बचने की मेरी तमाम चेष्टाओं को विफल करते हुए। मृत्युंजय ने कहा था- “तुम इसे लिखना।”

लिखा नहीं, इस कहानी को मैंने गुनगुनाया है। गुनगुनाते हुए इश्क़ के सातों मरहले मिले, बड़े मज़े-मज़े दिलकशी, उन्स, मोहब्बत, अक़ीदत, इबादत, जुनून और मौत की चौखट छू आई। कोई चाहे तो आए, साँच की इस आग में ख़ुदी को सेंक ले, जल जाए, प्रेम के इस पानी को चख कर बेख़ुद हो जाए, फिर मेरे साथ गुनगुनाए-

इश्क़ कुन वक़्त ज़ाया मकुन… इश्क़ कर, वक़्त ज़ाया मत कर!

– बाबुषा

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Description

जो दुनिया बहुत सारे कोलाहल से भरी है, लगभग हर पल एकान्त और स्मृति का अतिक्रमण करते सूचना- संजाल की मारी है, बहुत स्थूल और क्षणजीवी भावुकता की अभ्यस्त हो चली है, उसमें बाबुषा एक लगभग असम्भव लगता संवाद खोज लाती हैं- दो ऐसे लोगों के बीच, जो एक-दूसरे के लिए लम्बे समय तक अदृश्य रहे हैं, फ़ोन तक नहीं करते, ईमेल नहीं करते, आपस में मिलने का प्रयास भी नहीं करते – बस चिट्ठियाँ लिखते हैं।

Additional information

Author

Baabusha Kohli

Binding

Paperback

ISBN

978-81-943123-2-1

Language

Hindi

Publication date

01-12-2024

Publisher

Rukh publications

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