‘अल्लाह नाम की सियासत’ – हिलाल अहमद
अल्लाह नाम की सियासत एक बेहद विचारोत्तेजक पुस्तक है! यह किताब ऐसे वक़्त आयी है जब भारत में मुसलमानों और इस्लाम को लेकर बहुत सारी ग़लतफ़हमियों और अज्ञान का बाजार गर्म है। भ्रान्तियों और अविश्वास के पीछे किसी हद तक अपरिचय का कारण तो हमेशा रहा है लेकिन उन्हें बनाये रखने और फैलाने में जब एक जबर्दस्त निहित स्वार्थ काम कर रहा हो तो इनकी काट करना और सच तलाशना तथा सच बताना और मुश्किल हो जाता है। यह किताब इस चुनौती से पार पाने की कोशिश तो है ही, आजादी के बाद के भारत में इस्लाम और मुसलमानों के सन्दर्भ में उठने वाले सारे ज्वलन्त प्रश्नों पर गहराई से विचार करती है। इस क्रम में सेकुलर राजनीति की कमजोरियों की भी शिनाख्त की गयी है।
जमीन से कटे उदारवाद की हक़ीक़त बताने के साथ ही लेखक ने मुस्लिम समुदाय को महज एक वोट बैंक की तरह देखने वाली अस्मितावादी राजनीति को भी नहीं बख्शा है। यह किताब मुस्लिम राजनीतिक विमर्श के एकरंगी होने के मिथ को भी तोड़ती है और इसकी विभिन्न अन्तर-धाराओं को चिह्नित करती है।
इसके लेखक हिलाल अहमद इस विषय के एक गहन अध्येता और जाने-माने समाज विज्ञानी हैं। उन्होंने विवादों और मुद्दों को उनकी पृष्ठभूमि में खंगालने के साथ ही उनपर अपने तीन वैचारिक आदर्शों की रोशनी में विचार किया है। एक, सर्वशक्तिमान अल्लाह/ईश्वर के अस्तित्व में उनका आध्यात्मिक विश्वास है। दूसरा, ‘सर्वधर्म समभाव’ के महात्मा गाँधी के सिद्धान्त में उनकी आस्था है। और तीसरा, समतामूलक समाज के निर्माण के लिए उनकी प्रतिबद्धता है। इस आदर्श-प्रवणता के चलते यह पुस्तक अकादमिक अपेक्षाओं पर खरी उतरने के साथ ही उन सब लोगों के लिए एक अनिवार्य पाथेय की तरह है जो हमारे सेकुलर गणतन्त्र को, सहिष्णुता और विविधता की हमारी संस्कृति को तथा विभिन्न धर्मों और धार्मिकता को साम्प्रदायिक राजनीतिक विमर्श का शिकार होने से बचाना चाहते हैं। आमतौर पर सेकुलर विमर्श आधुनिकतावाद, निरीश्वरवाद, भौतिकवाद के आग्रहों और पश्चिमी प्रतिमानों से प्रेरित प्रभावित रहा है। लेकिन यह किताब उस ढर्रे से अलग है; यह अपने विमर्श में धर्मों के अन्याय विरोधी तथा मानवतावादी उत्स को भी शामिल करती है और इस प्रकार एक वृहत्तर सेकुलर मूल्य-मीमांसा प्रस्तुत करती है।
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