Description

एक महान् कृति, भारतीय समाज और परिवार के विकास की विविध दिशाओं और रूपों का एक विराट एवं प्रभावोत्पादक चित्र।

-डॉ. एस.एन. गणेशन

निकट अतीत के चित्रों का एक एलबम—वह अतीत जिसे वर्तमान पीढ़ी को न भूलना चाहिए और न जिससे विमुख ही होना चाहिए, क्योंकि उसी में हमारे नए जीवन का बीजारोपण हुआ था। परिवार के चित्रों के एलबम के विपरीत इस एलबम के चित्र धुँधले नहीं पड़े हैं, क्योंकि कैमरा एक ही रहा है। लैंसों का प्रयोग इस कुशलता से किया गया है कि चित्र बिल्कुल साफ़ और हूबहू अंकित हुए हैं, दूरी ने उन्हें धुँधला नहीं किया है, भावातिरेक या दुःख ने विकृत नहीं किया है।

—जगदीशचन्द्र माथुर

About the Author

भगवतीचरण वर्मा 30 अगस्त, 1903 को उन्माव जिले (उ॰प्र॰) के शफीपुर गॉव में जन्म । शिक्षा: इलाहाबाद से बी. ए., एल. एल. बी. । प्रारम्भ में कविता-लेखन । फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात भगवती बाबू 1933 के करीब प्रतापगढ़ के राजा साहब भदरी के साथ रहे । 1936 के लगभग फिल्म कार्पोरेशन, कलकत्ता में कार्य किया । कुछ दिनो तक ‘विचार’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन-सम्पादन और इसके खाद बम्बई में फिल्म-कथा लेखन तथा दैनिक ‘नवजीवन’ का सम्पादन । आकाशवाणी के लई केद्रों में भी कार्य । बाद में, 1957 से ‘मृत्यु-पर्यत्न स्वतंत्र साहित्यकार के रूप में लेखन । उनके बेहद लोकप्रिय उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर दोबार फ़िल्में बनीं । ‘भूले-बिसरे चित्र’ साहित्य अकादेमी से सम्मानित | पदमभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त । प्रकाशित पुस्तकें अपने खिलौने, पतन, तीन वर्ष, चित्रलेखा, भूले-बिसरे चित्र, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, सीधी सच्ची बाते, धुप्पल, रेखा, वह फिर नहीं आई, सबहि नचावत नाम गोसाई, प्रश्न और मरीचिका, युवराज चूण्डा (उपन्यास); प्रतिनिधि कहानियाँ, मेरी कहानियाँ, मोर्चाबन्दी तथा सम्पूर्ण कहानियाँ (कहानी-संग्रह); मेरी कविताएँ; सविनय और एक नाराज कविता (कविता-संग्रह); मेरे नाटक, वसीयत (नाटक); अतीत के गर्त से, कहि न जाय का कहिए (संस्मरण); साहित्य के-सिद्धान्त तथा रूप (सहित्यलोचन); भगवतीचरण वर्मा रचनावली ( 1 4 खंडो में) | निधन: 5 अक्टूबर, 1981.

Additional information

Dimensions 25 × 20 × 4 cm
Binding

Paperback

ISBN

978-8126717071

Language

Hindi

Pages

496

Publication date

1 January 2019

Publisher

‎ Rajkamal Prakashan

Writer

Bhagwaticharan Verma

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