Dharti Ka Nyay by Kushagra Rajendra and Vineeta Parmar
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धरती का न्याय – कुशाग्र राजेन्द्र, विनीता परमार
भारत ने अपनी आजादी के 75 सालों में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। अपनी सभ्यतागत अवधारणाओं के साथ विश्व परिदृश्य पर अपनी उपस्थिति दर्ज की है। अनेक क्षेत्रों में हमारी उपलब्धि काबिलेगौर है तो पर्यावरण प्रकल्पों पर हमारी गति धीमी है। उनमें से एक मसला है प्रकृति के साथ मानवीय सम्बन्ध में आए आमूलचूल परिवर्तन का। हालाँकि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, पानी का संकट, जैव-विविधता में कमी, मिट्टी का क्षय, महासागरों का प्रदूषण, कचरों का निस्तारण, जैसी समस्याएँ विकराल होती जा रही हैं, और भारत भी इन सबसे अछूता नहीं है। इनमें से अनेक समस्याएँ विकसित देशों द्वारा प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन करने का नतीजा हैं, जो बाकी देशों में विकास योजना का आधार बन गया है। भारत जैसा देश जो मानव सभ्यता का प्राचीनतम केन्द्र रहा है और उसका इतिहास प्रकृति के साथ परम्परागत रूप में सामंजस्य का एक समृद्ध दस्तावेज है, चाहे खेती का तरीका हो, खानपान की आदतें हों, पानी का प्रबन्धन हो, नदियों के साथ सामंजस्य हो, शहर निर्माण हो, गाँव की विकेन्द्रित अर्थ-व्यवस्था या फिर जंगल और जमीन से जुड़ी मान्यताएँ हों हर पहलू में पर्यावरण और प्रकृति के साथ सटीक तालमेल की जरूरत को समझा जा सकता है। इस पुस्तक में पर्यावरण से जुड़े संकटों को समझने की कोशिश की गयी है, और वर्तमान पर्यावरणीय द्वन्द्वों के विश्लेषण के लिए एक आवश्यक अन्तर्दृष्टि भी मिलती है।
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Description
Dharti Ka Nyay
by Kushagra Rajendra and Vineeta Parmar
कुशाग्र राजेन्द्र
भारत-नेपाल सीमा के पास चम्पारण
के गाँव भतनाहिया में जन्मे; मोतिहारी के जिला स्कूल और मुंशी सिंह महाविद्यालय से कॉलेज तक की शिक्षा, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान में मास्टर, एम. फिल. और पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। अकादमिक उत्कृष्टता पदक, भारत के राष्ट्रपति का प्रतिष्ठित स्वर्ण पदक जैसे सम्मान इन्हें मिले हैं। पर्यावरण और सतत विकास जैसे बहु-विषयक क्षेत्र में संस्थागत नेतृत्व, क्षमता निर्माण, शिक्षण, अनुसन्धान और प्रकाशन में डेढ़ दशक से अधिक का समृद्ध अनुभव।
पर्यावरण के जमीनी और क्षेत्रीय अध्ययन के सिलसिले में कच्छ, विन्ध्य, दक्कन, मध्य भारत, और छोटा नागपुर का पठार, हिमालय के निचले क्षेत्र सहित ब्रह्मपुत्र घाटी, गंगा के मैदान, गण्डकी नदी आदि क्षेत्रों के अकादमिक सर्वेक्षण का अनुभव।
वर्तमान में एमिटी यूनिवर्सिटी हरियाणा में पृथ्वी और पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख हैं और शिक्षण तथा अनुसन्धान के साथ-साथ पर्यावरण एवं सतत विकास के विभिन्न समसामयिक मुद्दों पर आम जन के लिए लेखन में सक्रिय हैं।
चम्पारण के छौड़ादानो में जन्मीं विनीता परमार पन्द्रह वर्षों से अधिक समय से पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरणीय शिक्षा और महिला विषयक मुख्यधारा के लेखन से जुड़ी हुई हैं। स्कूली शिक्षा छौड़ादानो फिर इन्दिरा गांधी बालिका विद्यालय, हजारीबाग से हुई। गंगा जल गुणवत्ता सूचकांक पर पी-एच.डी. (मगध विश्वविद्यालय) और महिला वैज्ञानिक योजना (खरपतवार विज्ञान एवं अनुसन्धान निदेशालय, जबलपुर) के तहत ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक उत्थान और खरपतवार नाशकों का पानी की गुणवत्ता पर प्रभाव का सूचकांक विकसित किया और पर्यावरण एवं अर्थशास्त्र के अपने अनुभवों को योजना आयोग (वर्तमान नीति आयोग) में (यंग प्रोफेशनल के रूप में) क्रियान्वित किया। डॉ. विनीता परमार पर्यावरण विज्ञान के साथ-साथ शिक्षा, अर्थशास्त्र और रसायन विज्ञान विषयों में स्नातकोत्तर हैं।
चर्चित पुस्तक ‘बाघ विरासत और सरोकार’ के अलावा ‘तलछट की बेटियाँ’ (कहानी संग्रह), ‘गर्दन हिलाती मछलियाँ’, ‘दूब से मरहम’ (कविता संकलन) तथा ‘धप्पा’ (संस्मरण संग्रह) प्रकाशित । वर्तमान में केन्द्रीय विद्यालय में विज्ञान शिक्षिका के रूप में कार्यरत, साथ ही लेखन में सक्रिय।
Additional information
| Author | Kushagra Rajendra and Vineeta Parmar |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| Language | Hindi |
| ISBN | 978-93-6201-844-1 |
| Pages | 216 |
| Publication date | 01-02-2025 |
| Publisher | Setu Prakashan Samuh |





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