यह किताब योजना बनाकर नहीं लिखी गई है। इसमें याद, नींद, स्वप्न, बचपन, आवारगी और गेंद की तरह उछलते-भागते जीवन के रेशे हैं।
मैं सुस्त और थोड़ा-बहुत दब्बू हूँ; लेकिन डरना नहीं चाहता। जब भी डरता हूँ, माँ की याद आती है। माँ की याद पूरा संसार है। याद करने पर माँ के साथ-साथ वह संसार भी चला आता है। मैं बार-बार माँ का और माँ के संसार का आह्वान करता हूँ। उससे मुझे शक्ति मिलती है।
मैं जहाँ पैदा हुआ, वहीं जवान हुआ। वहीं रहकर धीरे-धीरे बूढ़ा हो रहा हूँ। मरूँगा भी वहीं। मेरे पास वही एक जगह है। वहीं के अनुभव मेरे लिए यथार्थ हैं। स्मृति भी उसी जगह की परिक्रमा करती है। मैं वहीं से संसार को और ख़ुद को देखता हूँ। इस किताब में वह जगह कहीं नहीं है, लेकिन हर जगह है- जिसका नाम बनारस है।
बहुत-से अनुभवों के लिए शब्द नहीं होते। बचपन, पड़ोस, प्रकृति और बीते वक़्त के पास कई बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें हम कभी नहीं कह पाते। यह किताब उन्हीं बातों को कहने की कोशिश है। हिन्दी लेखक होने का रियाज़ करते हुए मनुष्य स्वीकृत, औपचारिक और चालू शिल्प में सोचने का अभ्यस्त हो जाता है। मैं ऐसी हालत से घबरा जाता हूँ और बहुत देर तक औपचारिक नहीं रह पाता। आप पाएँगे कि इस किताब में पर्याप्त अनौपचारिकता है।
किताब के नाम में एक जनपदीय भूलग़लती है। एक अर्थ में वही चीज़ हमारी अस्मिता है। हम उस ग़लती का पूरी शान के साथ आलिंगन करते हैं। वैसे भी यह किताब-गार्जियंस-पुरखों के बारे में है। जिनकी छाया ‘गार्जियनता’ ही इस टुकड़ा-टुकड़ा जिन्दगी का हासिल है।
– व्योमेश शुक्ल
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