Description

‘काठ का उल्लू’ को ‘दोआबा’ पत्रिका में प्रकाशित करते हुए, सम्पादकीय के अन्तर्गत एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की गई थी कि यह उपन्यास अपनी थीम के कारण पाठकों के बीच लोकप्रिय होगा। प्रश्न उठता है कि इस उपन्यास की ‘थीम’ है क्या? निःसन्देह इसका उत्तर एक शब्द में नहीं दिया जा सकता है। ‘काठ के उल्लू’ की थीम के कई स्तर हैं जो प्याज के छिलके की भाँति परत दर परत खुलते चले जाते हैं। सपनों में पलती नौकरशाही, अभिजात्य वर्ग की ढँकी-छुपी सच्चाई, स्याह-सफेद के बीच खिलवाड़ करती राजनीति… और एक सामान्य-सी लड़की को ‘दलित इकाई’ के रूप में बदल देने की चतुराई। अर्थात इस उपन्यास में हमारे समाज के इतने रंग हैं कि उन सबको मिला कर यदि ‘रंगामेज़ी’ शैली में कोई चित्र बनाया जाए तो वह बदरंग ही होगा, आकर्षक भले हो। जाहिर है कि यह एक जटिल यथार्थ है, जिसे एक छोटे से उपन्यास में व्यक्त कर देना आसान काम नहीं था। मगर, पल्लवी प्रसाद ने उसे बखूबी कर दिखाया है। इस उपन्यास में कई अन्य यथार्थ भी दर्ज हैं। जैसे गाँवों का ‘आधुनिक’ हो जाना, हर व्यक्ति का लगभग ‘आम आदमी’ हो जाना और अन्ततः कृष्णकान्त जैसे महत्वाकांक्षी व्यक्ति का ‘काठ का उल्लू’ बन जाना। उल्लू का पसन्दीदा समय ‘अँधेरा’ पूरे उपन्यास में आदि से अन्त तक छाया हुआ है। मगर लेखिका ने उसमें भी रोशनी की एक ‘झिरी’ देख ली है। वह है एक बूढ़ी स्त्री जो गाँव में रहती है और जो किसी की माँ है, किसी की दादी तो किसी की परदादी। वास्तव में इस ‘झिरी’ ने ही इस उपन्यास को वह सार्थकता बख्शी है, जो उसका मूल उदेश्य प्रतीत होती है। पल्लवी प्रसाद का यह उपन्यास ऐसे समय में आया है जबकि अभिजात्य वर्ग में ही नहीं बल्कि सामान्य जीवन में भी पारिवारिक सम्बन्धों की दीवारें दरक रही हैं। इसलिए इस उपन्यास का अपना अलग ही महत्त्व है। —अब्दुल बिस्मिल्लाह

About the author

पल्लवी प्रसाद का जन्म 7 दिसम्बर, 1969 को भावनगर, गुजरात में हुआ। उन्होंने यूनिवर्सिटी, भावनगर से बी.कॉम. और एल.एल.बी. तथा चौधरी देवीलाल यूनिवर्सिटी, सिरसा से एल.एल.एम. किया। उनकी पहली कहानी ‘मोहल्ला और मास्टरजी’ 2013 में ‘पाखी’ पत्रिका में प्रकाशित हुई। पिछले एक दशक में उनके तीन उपन्यास, पन्द्रह कहानियाँ, व्यंग्य, समीक्षा व अनेकानेक लेख और अनुवाद, ‘हंस’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘आजकल’, ‘कथादेश’, ‘पाखी’, ‘लमही’, ‘दोआबा’, ‘संवेद’, ‘सबलोग’, ‘युद्धरत आम आदमी’, ‘सत्राची’, ‘अहा! जिन्दगी’, ‘माटी’, ‘सदानीरा’, ‘रचना समय’, ‘इंडियन लिट्रेचर’, ‘डेवलपिंग इंडिया मिरर’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा गुजराती, मराठी और पंजाबी भाषाओं की भी जानकार हैं।

सम्प्रति : विधि व प्रशासनिक अधिकारी, जी.जी.एस.ई.एस.टी.सी., बोकारो, झारखंड।

Additional information

Dimensions 20 × 13 × 1 cm
Binding

Paperback

ISBN

978-9349180703

Language

Hindi

Pages

198

Publication date

9 January 2025

Publisher

Lokbharti Prakashan

Writer

Pallavi Prasad

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “Kaath Ka Ullu by Pallavi Prasad”

Your email address will not be published. Required fields are marked *