Kahat Kabeer by Harishankar Parsai
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हरिशंकर परसाई के व्यंग्य को श्रेष्ठतम इसलिए कहा जाता है कि उनका उद् देश्य कभी पाठक को हँसाना भी नहीं रहा। न उन्होंने हवाई कहानियाँ बुनीं, न ही तथ्यहीन विद्रूप का सहारा लिया। अपने दौर की राजनीतिक उठापटक को भी वे उतनी ही ज़िम्मेदारी और नज़दीकी से देखते थे जैसे साहित्यकार होने के नाते आदमी के चरित्र को। यही वजह है कि समाचार-पत्रों में उनके स्तम्भों को भी उतने ही भरोसे के साथ, बहैसियत एक राजनीतिक टिप्पणी पढ़ा जाता था जितने उम्मीद के साथ उनके अन्य व्यंग्य-निबन्धों को।
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Description
हरिशंकर परसाई के व्यंग्य को श्रेष्ठतम इसलिए कहा जाता है कि उनका उद् देश्य कभी पाठक को हँसाना भी नहीं रहा। न उन्होंने हवाई कहानियाँ बुनीं, न ही तथ्यहीन विद्रूप का सहारा लिया। अपने दौर की राजनीतिक उठापटक को भी वे उतनी ही ज़िम्मेदारी और नज़दीकी से देखते थे जैसे साहित्यकार होने के नाते आदमी के चरित्र को। यही वजह है कि समाचार-पत्रों में उनके स्तम्भों को भी उतने ही भरोसे के साथ, बहैसियत एक राजनीतिक टिप्पणी पढ़ा जाता था जितने उम्मीद के साथ उनके अन्य व्यंग्य-निबन्धों को।
इस पुस्तक में उनके चर्चित स्तम्भ ‘सुनो भई साधो’ में प्रकाशित 1983-84 के दौर की टिप्पणियाँ शामिल हैं। यह वह दौर था जब देश खालिस्तानी आतंकवाद से जूझ रहा था। ये टिप्पणियाँ उस पूरे दौर पर एक अलग कोण से प्रकाश डालती हैं, साथ ही अन्य कई राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं का उल्लेख भी इनमें होता है। ज़ाहिर है ख़ास परसाई-अन्दाज़ में। मसलन, 21 नवम्बर, 83 को प्रकाशित ‘चर्बी, गंगाजल और एकात्मता यज्ञ’ शीर्षक लेख की ये पंक्तियाँ। “काइयाँ साम्प्रदायिक राजनेता जानते हैं कि इस देश का मूढ़ आदमी न अर्थनीति समझता, न योजना, न विज्ञान, न तकनीक, न विदेश नीति। वह समझता है गौमाता, गौहत्या, चर्बी, गंगाजल, यज्ञ। वह मध्ययुग में जीता है और आधुनिक लोकतंत्र में आधुनिक कार्यकर्म पर वोट देता है। इस असंख्य मूढ़ मध्ययुगीन जन पर राज करना है तो इसे आधुनिक मत होने दो।”
हरिशंकर परसाई
22 अगस्त, 1924 को मध्य प्रदेश, होशंगाबाद के जमानी गाँव में जन्मे हरिशंकर परसाई का आरम्भिक जीवन कठिन संघर्ष का रहा। पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया और फिर ‘डिप्लोमा इन टीचिंग’ का कोर्स भी।
उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं–‘हँसते हैं रोते हैं’, ‘जैसे उनके दिन फिरे’ (कहानी-संग्रह); ‘रानी नागफनी की कहानी’, ‘तट की खोज’ (उपन्यास); ‘तब की बात और थी’, ‘भूत के पाँव पीछे’, ‘बेईमानी की परत’, ‘वैष्णव की फिसलन’, ‘पगडंडियों का ज़माना’, ‘शिकायत मुझे भी है’, ‘सदाचार का तावीज़’, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’, ‘तुलसीदास चन्दन घिसैं’, ‘हम इक उम्र से वाकिफ हैं’, ‘जाने-पहचाने लोग’, ‘कहत कबीर’, ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ (व्यंग्य निबन्ध-संग्रह); ‘पूछो परसाई से’ (साक्षात्कार)। ‘परसाई रचनावली’ शीर्षक से छह खंडों में उनकी सभी रचनाएँ संकलित हैं। लगभग सभी भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में उनकी रचनाओं के अनुवाद हुए हैं।
उन्हें ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’, मध्य प्रदेश के ‘शिखर सम्मान’ समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
10 अगस्त, 1995 को उनका निधन हुआ।
Additional information
| Dimensions | 22 × 14 × 1 cm |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | 9788126728534 |
| Language | Hindi |
| Pages | 164 |
| Publication date | 1 January 2015 |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Writer | Harishankar Parsai |


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