Description
किसान नहीं होंगे तो हम नहीं होंगे। खेती नहीं होगी तो ये शहर नहीं होंगे जहाँ हम उस विशाल आबादी से आँखें चुराए इत्मीनान से रहते हैं, जिस आबादी का सब कुछ खेती पर निर्भर है, वे लोग जो अन्न उगाते हैं, लेकिन अकसर खाली पेट सोते हैं, कर्ज लेते हैं और फिर आत्महत्या कर लेते हैं। हैरानी की बात है कि इतने महत्त्वपूर्ण क्षेत्र पर न तो नीति-निर्माताओं का फोकस है, न ही नागरिक चेतना का। ‘किसानी की कहानी : बेटी के लिए’ हमारा ध्यान उस ओर खींचती है, और एकदम अलग और नए ढंग से। किताबों, खबरों और निजी अनुभवों के माध्यम से आजादी से पहले और बाद के वक्तों पर नजर डालते हुए यह किताब भारतीय किसान और खेती की पीड़ा को हमारी सोच के केन्द्र में ला देती है।
सोरित गुप्तो
सोरित गुप्तो का जन्म 03 मई, 1970 को इलाहाबाद में हुआ। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राणिविज्ञान में एम.एससी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने बच्चों के लिए तीस से अधिक पुस्तकें लिखी हैं जिनमें प्रमुख हैं— ‘बंटी और बबली’, ‘पिउ और उसके जादुई दोस्त’। भारतीय भाषाओं और विदेशी भाषाओं में इन पुस्तकों के कई अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। इनके अतिरिक्त नोटबंदी और समाज पर पड़े उसके असर की छानबीन करती किताब ‘नोटबंदी की ओट में’ तथा व्यंग्य-संग्रह ‘दिल्ली बाईस्कोप’ प्रकाशित। ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका में नियमित व्यंग्य स्तम्भ ‘बैठे ठाले’ का लेखन।
लम्बे समय तक ‘द पायनियर’, ‘सहारा टाइम्स’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘आउटलुक’ आदि पत्र-पत्रिकायों में एडिटोरियल कार्टूनिस्ट रहे।
फिलहाल सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरन्मेंट (CSE) से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘डाउन टू अर्थ’ में चीफ कार्टूनिस्ट के रूप में कार्यरत हैं।






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