Lucknow : Nawabi-badshahi Kaal Aur 1857 Ki Kranti Ki Gatha By Rajgopal Singh Verma
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नवाबी-बादशाही काल और 1857 की क्रान्ति की गाथा – लखनऊ – राजगोपाल सिंह वर्मा
अवध का इतिहास एक वृहद् विषय है। यह शून्य से शुरू होकर उत्कर्ष और ईस्ट इण्डिया कम्पनी से ब्रिटिश साम्राज्य के महत्त्वपूर्ण प्रक्षेत्र में बदलने की कहानी है तो शेखजादाओं से आरम्भ होकर नवाबी युग और फिर बादशाहत, 1857 के लम्बे चले संघर्ष का घटनाक्रम भी है। यह उत्तर भारत की उस ऐतिहासिक विरासत, संस्कृति और तहजीब का जीवन्त और विशद आख्यान है, जिसे इतिहास के किसी कालखण्ड में अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह पुस्तक अवध के पूरे इतिहास को समेटने का प्रयास न होकर उसके बनने, बिगड़ने, सँभलने और नवाबी युग से बादशाहत के साम्राज्य में फैलने/संकुचित होने की वह कहानी है, जिसे हम जानने की उत्कण्ठा रखते हैं। इस पुस्तक में शेखजादाओं के बाद से सआदत खान और सफदरजंग के गौरवशाली इतिहास का वर्णन है, उनके शून्य से शिखर तक पहुँचने और चर्चित आखिरी बादशाह वाजिद अली शाह के शासन काल तक दरक कर विस्मृत हो जाने के समय की कथा के मुख्य बिन्दुओं का लेखन किया गया है। सन् 1801 के बाद से, जब ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी अपनी निश्चितता के साथ उत्तर भारत की प्रमुख रियासतों में पाँव पसार रही थी तो अवध पर उनकी सतर्क निगाह शुरू से ही बनी हुई थी। ऐसा एक तो इस प्रान्त की सामरिक स्थिति के कारण था, तो यहाँ की समृद्धि, सामरिक स्थिति और दिल्ली से निकटता के कारण। इसीलिए यह किताब उन घटनाक्रमों का अनायास ही इतिहास सम्मत विश्लेषण करने की कोशिश भी करती है, जिनके माध्यम से ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सत्ता अवध को अपने साम्राज्य का अभिन्न अंग बनाने को बेचैन थी।
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Description
Lucknow : Nawabi-badshahi Kaal Aur 1857 Ki Kranti Ki Gatha By Rajgopal Singh Verma
नवाबी-बादशाही काल और 1857 की क्रान्ति की गाथा
लखनऊ – राजगोपाल सिंह वर्मा
पुस्तक के दूसरे हिस्से में 1857 की क्रान्ति की लखनऊ और अवध की जर्मी पर सबसे बड़ी उपलब्धि चिनहट की लड़ाई की विस्तृत चर्चा है। इस एक दिन के युद्ध में, जो 30 जून 1857 को हुआ था, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना को उनसे अलग हुए बागी संघर्षकारी सैनिकों और स्थानीय लोगों के अनुशासित तथा जुनूनी बल ने एक अप्रत्याशित और कड़ी शिकस्त दी थी। ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी की यह पराजय इतनी निर्णायक थी कि कम्पनी के अनेकों सैनिकों अफसरों को अपनी जानें गँवानी पड़ीं और वे जो भागकर रेजीडेंसी में घुसे तो अगले कई महीनों तक संघर्षकारी सैनिकों और जुनूनी क्रान्तिकारियों ने उनकी वहीं घेराबन्दी कर बाहर निकलने के रास्ते बन्द कर दिये। लखनऊ और अवध में ये स्थितियाँ देर से आयीं, लेकिन मजबूती से चलीं, देर तक कायम रहीं और वहाँ के गाँव गाँव तक फैल गयी थीं। अवध प्रान्त के चीफ कमिश्नर हेनरी लॉरेंस, जिन्हें भारत के अगले गवर्नर-जनरल के पद के लिए नामित किया गया था, सहित ब्रिटिश पक्ष के अन्य कई महत्त्वपूर्ण अधिकारी-सैनिक भी मारे गये थे। ऐसे में इंग्लैण्ड सरकार आततायी भूमिका के रूप में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के जायज-नाजायज कार्यकलापों का समर्थन करने, इस जनक्रान्ति को कुचलने तथा देश के जुनूनी और समर्पित क्रान्तिकारियों को उनके ‘दुस्साहस’ की सजा देने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती थी। लखनऊ और निकटवर्ती क्षेत्रों को फिर से जीतने के लिए इंग्लैण्ड सरकार ने एक विशिष्ट अभियान को स्वीकृति दी थी। इस हेतु जनरल कॉलिन कैम्पबेल को इंग्लैण्ड से लखनऊ भेजा जाना इस अभियान की महत्ता को बताता है। पर अवध के विभिन्न इलाकों के ताल्लुकेदारों, जमींदारों और आम जन ने भी फिरंगी ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए जो एकजुटता की भावना दिखाई थी, वह अद्भुत थी। लोगों को स्वराज चाहिए था, और चाहिए थी फिरंगी प्रताड़ना से मुक्ति ! क्रान्ति की यह ज्वाला कितनी सफल हुई, यह अर्थहीन है। अवध और आसपास के इस जन संघर्ष का गहन वर्णन प्रामाणिकता के साथ सामने लाया गया है।
Additional information
| Weight | 1 g |
|---|---|
| Dimensions | 345 × 455 cm |
| Author | Rajgopal Singh Verma |
| Binding | Paperback |
| Language | Hindi |
| ISBN | 978-93-6201-444-3 |
| Pages | Pages |
| Publisher | Setu Prakashan Pvt Ltd |





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