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Machhali Mari Hui – My Setu Shop

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मछली मरी हुई’ राजकमल चौधरी का एक साहसिक, प्रयोगधर्मी और विचारोत्तेजक उपन्यास है, जो अपने प्रकाशन के साथ ही साहित्यिक जगत में चर्चा का केंद्र बन गया था। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि मानवीय मन की जटिलताओं, सामाजिक विडंबनाओं और समय के बदलते स्वरूप का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कोई एक निश्चित विषय नहीं है, बल्कि यह कई भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक परतों के बीच चलने वाला एक विचार-प्रवाह है। यही कारण है कि यह अपने समय के अन्य हिन्दी उपन्यासों से अलग और विशिष्ट दिखाई देता है।

इस कृति में लेखक ने मानवीय मनोवृत्तियों की गहराइयों को अत्यंत सरल और सहज भाषा में उकेरा है। पात्रों के व्यवहार, उनकी संवेदनाओं और उनके भीतर चल रहे संघर्षों के माध्यम से जीवन के उन पहलुओं को सामने लाया गया है, जिन पर सामान्यतः ध्यान नहीं जाता। उपन्यास अपने समय के परिवेश का भी सजीव चित्रण करता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का कलकत्ता, वहाँ का उद्योग-जगत, मजदूरों का जीवन और उस दौर की सामाजिक परिस्थितियाँ इसमें बड़े ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत की गई हैं।

उपन्यास का प्रमुख पात्र निर्मल प एक ऐसा चरित्र है जो पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ता है। वह विरोधाभासों से भरा हुआ व्यक्ति है—उसके भीतर एक ओर कठोरता और आक्रामकता है, तो दूसरी ओर गहरी संवेदनशीलता और मानवीयता भी। वह बाहर से कठोर और हिंस्र प्रतीत होता है, परंतु अपने परिवार, विशेषकर माँ और पत्नी के प्रति उसका व्यवहार अत्यंत कोमल और भावनात्मक है। यही विरोधाभास उसे एक जीवंत और यादगार पात्र बनाते हैं।

निर्मल प की कर्मठता, ईमानदारी और नैतिकता इस उपन्यास की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। वह अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करता, चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हों। मजदूरों के प्रति उसका उदार दृष्टिकोण और किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार या छल-कपट से उसकी घृणा उसके चरित्र को और भी मजबूत बनाती है। वह रिश्वत देने या लेने के खिलाफ है और हर स्थिति में अपने आत्मसम्मान को बनाए रखने की कोशिश करता है।

उपन्यास के अधिकांश पात्र मानसिक और भावनात्मक संघर्षों से जूझते दिखाई देते हैं। लेखक ने इन मानसिक स्थितियों को केवल दिखाया ही नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे सामाजिक कारणों की ओर भी संकेत किया है। उद्योगपतियों की चालबाज़ियाँ, व्यापारिक षड्यंत्र और समाज में फैली असमानता का चित्रण लेखक की सामाजिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह उपन्यास केवल व्यक्तियों की कहानी नहीं, बल्कि पूरे समाज की जटिलताओं का दर्पण है।

इसके साथ ही, इस कृति को स्त्री-समलैंगिकता जैसे संवेदनशील विषय को छूने वाली एक साहसी रचना के रूप में भी देखा जाता है। लेखक ने इस विषय को बिना किसी आडंबर के, सहज और संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया है, जो उस समय के साहित्य में एक अनोखा प्रयोग था।

अपनी रोचक शैली, गहरे मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और सामाजिक यथार्थ के सशक्त चित्रण के कारण ‘मछली मरी हुई’ आज भी एक कालजयी कृति के रूप में याद की जाती है। यह उपन्यास केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि समझने और महसूस करने के लिए लिखा गया है, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है और लंबे समय तक उनके मन में अपनी जगह बनाए रखता है।

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Description

राजकमल चौधरी हिन्दी और मैथिली साहित्य के एक महत्वपूर्ण और बहुमुखी रचनाकार थे, जिनका जन्म 13 दिसम्बर 1929 को अपने ननिहाल रामपुर हवेली में हुआ। उनका पितृग्राम महिषी (सहरसा, बिहार) था। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद उन्होंने इंटरमीडिएट आर्ट्स में नामांकन लिया, लेकिन बाद में उसे छोड़कर भागलपुर आ गए और इंटरमीडिएट कॉमर्स में प्रवेश लिया। उन्होंने मारवाड़ी कॉलेज, भागलपुर से 1955 में आई.कॉम. तथा 1953 में गया कॉलेज से बी.कॉम. की शिक्षा प्राप्त की। लेखन की शुरुआत भी उन्होंने भागलपुर से ही की थी, जो आगे चलकर उनके जीवन का मुख्य आधार बन गया।

शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अधिकतर समय कलकत्ता में बिताया, जहाँ वे साहित्यिक गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। उन्होंने हिन्दी और मैथिली की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया और अपने लेखन से एक अलग पहचान बनाई। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने पूरी तरह स्वतंत्र लेखन को ही अपना कर्मक्षेत्र बना लिया। 19 जून 1967 को पटना के एक अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।

राजकमल चौधरी ने उपन्यास, लघु उपन्यास, कविता और कहानी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। हिन्दी में उनकी प्रमुख कृतियों में ‘अग्निस्नान’, ‘शहर था शहर नहीं था’, ‘नदी बहती थी’, ‘ताश के पत्तों का शहर’ और ‘मछली मरी हुई’ जैसे उपन्यास शामिल हैं। ‘बीस रानियों के बाइस्कोप’ और ‘एक अनार: एक बीमार’ उनके चर्चित लघु उपन्यास हैं। कविता के क्षेत्र में ‘मुक्ति प्रसंग’, ‘कंकावती’ और ‘इस अकाल वेला में’ उनके महत्वपूर्ण संग्रह हैं, जबकि ‘मछली जाल’ और ‘सामुद्रिक एवं अन्य कहानियाँ’ उनके प्रमुख कहानी-संग्रह हैं।

मैथिली भाषा में भी उनका योगदान अत्यंत समृद्ध रहा। ‘आदि कथा’, ‘पाथरफूल’ और ‘आंदोलन’ उनके प्रमुख उपन्यास हैं, जबकि ‘स्वरगंधा’ और ‘कविता राजकमलक’ उनके कविता-संग्रह हैं। ‘एकटा चंपाकली विषधर’ और ‘कृति राजकमलक’ उनके उल्लेखनीय कहानी-संग्रह हैं।

उन्होंने अनुवाद के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया और मूल बांग्ला से शंकर के उपन्यास ‘चौरंगी’ तथा वाणी राय के ‘चोखे आमार तृष्णा’ का हिन्दी में अनुवाद किया। अपनी संवेदनशीलता, प्रयोगधर्मिता और गहरी सामाजिक दृष्टि के कारण राजकमल चौधरी का साहित्य आज भी प्रासंगिक और प्रभावशाली माना जाता है। उनकी रचनाओं का संकलन ‘राजकमल चौधरी रचनावली’ के रूप में प्रकाशित होने की दिशा में भी प्रयास किए गए, जो उनके साहित्यिक योगदान की व्यापकता को दर्शाता है।

Additional information

Author

Rajkamal Chaudhari

Publisher

‎ Rajkamal Prakashan

Binding

Paperback

Language

Hindi

Pages

172

Publication date

01-07-2019

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