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Neem Ka Ped

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इस पुस्तक की ख़ास बातें –

१ ) राही मासूम रज़ा के कहानियों की ताक़त उनकी भाषा शैली और उनके किरदारों की बेबाक़ी है। राही मासूम रज़ा ओस की बूंद की भूमिका में कहते हैं कि उन्हें साहित्य अकादमी का लोभ नहीं है। वे आगे कहते हैं कि ” परन्तु मैं साहित्यकार हूँ। मेरे पात्र यदि गीता बोलेंगे तो मैं गीता के श्लोक लिखूँगा। और वे गालियाँ बकेंगे तो मैं अवश्य उनकी गालियाँ भी लिखूँगा। मैं कोई नाज़ी साहित्यकार नहीं हूँ कि अपने उपन्यास के शहरों पर अपना हुक्म चलाऊँ और हर पात्र को एक शब्दकोश थमाकर हुक्म दे दूँ कि जो एक शब्द भी अपनी तरफ़ से बोले तो गोली मार दूँगा ” । राही मासूम रज़ा अपने किरदारों को हर तरह से परिवेश के अनुकूल ढालते हैं और पूरी कहानी को एक डोरी से बाँधे रहते हैं।

२) नीम का पेड़ पढ़ कर एक बात साफ़ हो जाती है कि सत्ता का अपना एक नशा होता है और उसे पाने के लिए कोई भी किसी भी हद तक गिर सकता है। सत्ता में शामिल होने वाला हर एक प्राणी ख़ुद को सत्ता के रंग में ढाल लेता है और सच्चे, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और जनकल्याण के बारे में सोचने वाले लीडरों को काफ़ी संघर्ष करना पड़ता है। उनके इतने दुश्मन पैदा हो जाते हैं कि जान से हाथ धो बैठने की नौबत पैदा हो जाती है। हर कोई सामिन मियाँ जैसा भाग्यशाली नहीं होता है कि गोली से छलनी शरीर को पुनः जीवनदान मिल जाये।

३) भाषा और लहज़े का कितना महत्व है वो इस कहानी से साफ़ उजागर होता है। कहने को मुसलिम मियाँ डिप्टी मिनिस्टर थे और ग़रीबों पर उन्होंने भी कम ज़ुल्म नहीं ढाए थे, घाट-घाट का पानी उन्होंने भी पी रखा था परन्तु वे ज़मीदारी और सियासत के सारे तौर तरीकों से वाकिफ़ थे। अलीगढ़ के पढ़े हुए थे – अहदे ज़ुबान थे और समय के साथ चलना जानते थे। न जाने कितने लोगों पर कितने अत्याचार किये थे जिनमें बुधई भी शामिल था लेकिन बदनाम मियाँ ज़ामिन ज़ियादा थे जो दो टूक बातें किया करते थे और चिकनी चुपड़ी बातों में लोगों को फँसाते नहीं थे।

मगर कहानी जब अपने अंत पर आती है तो क्या विधाता न्याय नहीं करता ? सोच कर हैरान होता हूँ कि मुसलिम मियाँ का लड़का एक मनचला आशिक़, नौकरानियों के साथ सोने वाला, ड्रग्स करने वाला और अपनी ख़ुद की बीवी की नज़रों में गिरा हुआ ज़लील इंसान बन कर उभरता है तो वहीं मियाँ ज़ामिन का बेटा सारे गाँव का चेहता बनता है, न जाने कितने ग़रीबों की दुआओं से उसकी झोली भरी होती है और अपने बाप की सभी ख़्वाहिश पूरी भी करता है। मुझे तो ऐसा लगता है कि मियाँ ज़ामिन सब कुछ हार कर भी अंत में सब कुछ जीत जाते हैं और मुसलिम मियाँ सब को जीत कर भी सब कुछ हार जाते हैं। ख़ैर इसका फ़ैसला आप बस पुस्तक पढ़ कर करिएगा।

४) इस कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरी नज़र में यह है कि अंत तक कहानी एक ही धागे में कसी नज़र आती है। हर एक किरदार मोती समान कहानी को रोचक और सुंदर बनाता है तथा कहानी को उसके गंतव्य तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाता नज़र आता है।

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Description

About the Author

जन्म: 1 सितम्बर, 1925। जन्मस्थान: गाज़ीपुर (उत्तर प्रदेश)।प्रारम्भिक शिक्षा वहीं, परवर्ती अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से ही ‘उर्दू साहित्य के भारतीय व्यक्तित्व’ पर पी-एच.डी.। अध्ययन समाप्त करने के बाद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में अध्यापन-कार्य से जीविकोपार्जन की शुरुआत। कई वर्षों तक उर्दू-साहित्य पढ़ाते रहे। बाद में फिल्म-लेखन के लिए बम्बई गए। जीने की जी-तोड़ कोशिशें और आंशिक सफलता। फिल्मों में लिखने के साथ-साथ हिन्दी-उर्दू में समान रूप से सृजनात्मक लेखन। फिल्म-लेखन को बहुत से लेखकों की तरह ‘घटिया काम’ नहीं, बल्कि ‘सेमी क्रिएटिव’ काम मानते थे। बी.आर. चोपड़ा के निर्देशन में बने महत्त्वपूर्ण दूरदर्शन धारावाहिक ‘महाभारत’ के पटकथा और संवाद-लेखक के रूप में प्रशंसित।एक ऐसे कवि-कथाकार, जिनके लिए भारतीयता आदमीयत का पर्याय रही।प्रकाशित पुस्तकें: आधा गाँव, टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, ओस की बूँद, दिल एक सादा काग़ज़, कटरा बी आज़ूर्, असन्तोष के दिन, नीम का पेड़, कारोबारे तमन्ना, क़यामत (हिन्दी उपन्यास); मुहब्बत के सिवा (उर्दू उपन्यास); मैं एक फेरीवाला (हिन्दी कविता-संग्रह); नया साल, मौजे-गुल: मौजे सबा, रक्से-मय, अजनबी शहर: अजनबी रास्ते (उर्दू कविता-संग्रह); अट्ठारह सौ सत्तावन(हिन्दी-उर्दू महाकाव्य) तथा छोटे आदमी की बड़ी कहानी (जीवनी)।

Additional information

Author

Rahi Masoom Raza

Binding

Paperback

ISBN

978-8126708611

Language

Hindi

Pages

91

Publication date

1 January 2016

Publisher

Rajkamal Prakashan Pvt. Ltd

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