Stri Mere Bhitar by Pawan Karan
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प्रिय पापा, ‘कथन’ के अक्तूबर-दिसम्बर 2001 अंक में, आपकी कविता ‘एक ख़ूबसूरत बेटी का पिता’ पढ़ी। आप अत्यन्त संवेदनशील हैं और हर चीज़ पर गम्भीरता से विचार करते हैं, यह तो मुझे पहले से ही पता है। लेकिन मुझे लेकर आप इतनी गहरी उधेड़बुन में पड़े हुए हैं, इसका मुझे एहसास तक नहीं था।
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Description
प्रिय पापा, ‘कथन’ के अक्तूबर-दिसम्बर 2001 अंक में, आपकी कविता ‘एक ख़ूबसूरत बेटी का पिता’ पढ़ी। आप अत्यन्त संवेदनशील हैं और हर चीज़ पर गम्भीरता से विचार करते हैं, यह तो मुझे पहले से ही पता है। लेकिन मुझे लेकर आप इतनी गहरी उधेड़बुन में पड़े हुए हैं, इसका मुझे एहसास तक नहीं था।
चूँकि आपने अपनी इस कविता में सब कुछ खोलकर रखा है इसलिए मैं भी आपको साफ़-साफ़ बताना चाहती हूँ कि आपकी सीख मुझे बहुत देर से मिली। आप चाहते हैं कि मेरी बेटी प्रेम करे तो थोड़ा रुककर क्योंकि ‘प्रेम करने की सही उम्र नहीं यह’ और ‘मेरी बेटी काँपते और डरते हुए नहीं, इस डगर पर/सँभलकर चलते हुए करे प्रेम/अपने भीतर अद्भुत स्वाद लिए बैठे प्रेम के इस फल को/वह हड़बड़ी में नहीं धैर्य से नमक के साथ चखे।’
आपकी ही बेटी ठहरी, इसलिए मैंने ख़ूब सोच-समझकर, जितना पता लगा सकती थी, पता लगाकर अपने स्कूल के राजीव से प्रेम किया था। वह मुझसे एक क्लास आगे है। सुन्दर और पढ़ाई में बहुत तेज़ है।
आज भी हम दोनों प्रेम के आनन्द की नदी में बहते होते, अगर उसने एक किताब में रखकर यह चिट न दी होती—‘आइ एम प्राउड दैट द मोस्ट ब्यूटीफुल गर्ल ऑन दिस अर्थ बिलांग्स टू मी।’ इसे पढ़ते ही मेरी शिराएँ तन गईं—तो राजीव भी सिर्फ़ मेरी सुन्दरता को चाहता है?
पापा, मुझे लगता है कि वे लड़कियाँ जल्दी परिपक्व हो जाती हैं, जो सामान्य से कम या सामान्य से ज़्यादा सुन्दर होती हैं। शायद दोनों ही हर काम, प्रेम भी ठोक-बजा कर यानी गणितपूर्वक करती हैं। मैं भी अपने को ऐसा ही मानती थी। पर मेरे पहले चुनाव ने ही मुझे बता दिया कि गणित भी हमेशा काम नहीं करता।
लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आता कि अगर मुझसे ‘कुछ’ हो ही जाता है, तो उसे ‘गलती’ कहना कहाँ तक ठीक है। आपसे उम्र और बुद्धि में बहुत ही छोटी हूँ, पर आपके द्वारा दिए गए भरोसे के आधार पर ही कहना चाहती हूँ कि सोच-समझ कर किया गया कोई भी काम ‘गलती’ की श्रेणी में नहीं आ सकता। किसी काम के नतीजे अच्छे नहीं निकले, तो अपने निर्णय को क्यों कोसना। इमर्सन ने कहा है कि सभी निर्णय सीमित जानकारी के आधार पर किए जाते हैं और यह संसार असीम है। ग़लती तब है, जब अस्वीकार्य नतीजे आने के बाद भी आदमी अपने निर्णय से चिपका रहे। पापा मुझे आशीर्वाद दो कि अपना ही फ़ैसला जब मेरी त्वचा में चुभने लगे, तो मैं उससे फ्री हो सकूँ।
—आपकी बेटी राधा
(पवन करण की ‘एक ख़ूबसूरत बेटी का पिता’ कविता के सन्दर्भ में राजकिशोर के एक लेख से)
पवन करण
जन्म : 18 जून, 1964; ग्वालियर (म.प्र.)।
शिक्षा : पीएच.डी. (हिन्दी), जनसंचार एवं मानव संसाधन विकास में स्नातकोत्तर पत्रोपाधि।
प्रकाशित काव्य-संग्रह : ‘इस तरह मैं’, ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफ़ोन’, ‘कहना नहीं आता’, ‘कोट के बाज़ू पर बटन’, ‘कल की थकान’ और ‘स्त्रीशतक’ खंड–एक एवं ‘स्त्रीशतक’ खंड–दो प्रकाशित।
अॅंग्रेज़ी, रूसी, नेपाली, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, गुजराती, असमिया, बांग्ला, पंजाबी, उड़िया तथा उर्दू में कविताओं के अनुवाद। कविताएँ विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में शामिल।
कविता-संग्रह ‘स्त्री मेरे भीतर’ मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, उर्दू तथा बांग्ला में प्रकाशित। संग्रह की कविताओं का नाट्य-मंचन।
सम्मान : ‘रामविलास शर्मा पुरस्कार’, ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी सम्मान’, ‘शीला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान’, ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, ‘स्पंदन सम्मान’।
सम्प्रति : ‘नवभारत’ एवं ‘नई दुनिया’ ग्वालियर में साहित्यिक पृष्ठ ‘सृजन’ का सम्पादन तथा साप्ताहिक साहित्यिक स्तम्भ ‘शब्द-प्रसंग’ का लेखन।
Additional information
| Dimensions | 22 × 14 × 1 cm |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | 9788126711406 |
| Language | Hindi |
| Pages | 103 |
| Publication date | 1 January 2012 |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Writer | Pawan Karan |


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