Description
आमतौर पर माना जाता है कि आर्य और द्रविड़ भाषाओं का सम्बन्ध दो अलग-अलग भाषा परिवारों से है। ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता’ पुस्तक इसी धारणा का खंडन करती है और यह सिद्ध करने का प्रयास करती है कि आर्य और भारोपीय भाषाओं का स्रोत वही है जो द्रविड़ भाषाओं का।
जिन तथ्यों को आधार मानकर यह प्रबन्ध अपनी इस धारणा को स्पष्ट करता है, उनमें सबसे प्रमुख यह है कि भारोपीय और द्रविड़ भाषाओं में तात्विक विभेद नहीं है और यह कि इन भाषाओं का विकास भारतीय परिवेश में ही हुआ था।
विभिन्न भाषाओं की शब्दावली और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए यह पुस्तक भाषा की आदिम अवस्था और विकास क्रम का विश्लेषण भी करती है तथा वैदिक, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक बोलियों की सामान्य प्रवृत्तियों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि इन बोलियों के स्वरूप को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम इन्हें अलग मानकर चलेंगे।
लेखक के अपने शब्दों में इस ‘कृति का गम्भीरता से अध्ययन करने के बाद इतना तो स्पष्ट हो जाएगा कि इसका उद्देश्य कुतूहल उत्पन्न करना नहीं है।’ यह एक बेहद उलझी हुई समस्या को समझने और उसका कोई समाधान ढूँढ़ने का एक जिम्मेदार प्रयास है।
भाषा के गम्भीर अध्येताओं के लिए एक विचारोत्तेजक कृति।
About The Author
भगवान सिंह
जन्म : 1931 में गोरखपुर जनपद के गगहा गाँव में। साहित्य की विविध विधाओं में लेखन। उनका शोधपरक लेखन इतिहास और भाषा के क्षेत्र में रहा है।
प्रकाशित कृतियाँ : ‘काले उजले टीले’ (1964); ‘महाभिषग’ (1973); ‘अपने-अपने राम’ (1992); ‘परम गति’ (1999); ‘उन्माद’ (2000); ‘शुभ्रा’ (2000); ‘अपने समानान्तर’ (1970); ‘इन्द्र धनुष के रंग’ (1996)।
शोधपरक रचनाएँ : ‘स्थान नामों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन’ (अंशत: प्रकाशित, ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’, 1973); ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता’ (1973); ‘हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य’—दो खंडों में (1987); ‘दि वेदिक हड़प्पन्स’ (1995); ‘भारत तब से अब तक’ (1996); ‘भारतीय सभ्यता की निर्मिति’ (2004); ‘भारतीय परम्परा की खोज’ (2011); ‘प्राचीन भारत के इतिहासकार’ (2011); ‘कोसम्बी : मिथक और यथार्थ’ (2011); ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं का अन्त:सन्बन्ध’ (2013); ‘इतिहास का वर्तमान’ (2016)।
सम्प्रति : ‘ऋग्वेद की परम्परा’ पर धारावाहिक लेखन, ‘नया ज्ञानोदय’ में।






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