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Sawarna Aur Awarna Ki Utpatti – Suvira Jaiswal

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सवर्ण और अवर्ण की उत्पत्ति – सुवीरा जायसवाल

‘दलित’ समस्या की ऐतिहासिक जड़ें तथा कुछ अन्य निबन्ध

(संकलन और सम्पादन रंजन आनन्द)


“प्रो. सुवीरा जायसवाल ने जाति-व्यवस्था पर अपने शोधों को प्रस्तुत किया था। उन्होंने धर्म, वर्ण, जाति और जेण्डर पर उपलब्ध साक्ष्यों के आलोक में विस्तृत विमर्श करने के पश्चात उनके अन्तर्सम्बन्धों को उजागर किया है।”


तो भी ज्यादातर दलित जातियाँ आज भी ग्रामीण भारत में ऐसी स्थितियों में रहती हैं जिन्हें हम सामन्तवाद के प्रारम्भिक दिनों में देखते हैं, जब ज्यादा से ज्यादा जनजातीय वास को सामन्ती सम्पत्ति के एक अंग के रूप में कृषक बस्तियों में तब्दील कर दिया गया और उन्हें उनके उत्पादन के साधनों से वंचित कर जमीन के नये नियन्त्रकों पर निर्भर कर दिया गया। वे जाति व्यवस्था के आवश्यक अंग भी और ‘जाति बहिष्कृत’ भी हो गये। सापेक्षिक अशुद्ध जन्म और अशुद्ध व्यवसायों के ब्राह्मणवादी सिद्धान्त को शोषित जातियों ने भी आत्मसात कर लिया और उन्होंने बड़े उत्साहपूर्वक अपनी जाति की सीमाओं को बनाये रखते हुए उनके प्रति तिरस्कार का भाव दिखाया जो जाति के सोपान में उनसे भी नीचे थे। इस मानसिकता ने गहरी पैठ बना ली और यह सर्वविदित है कि इस मानसिकता ने न केवल शोषण की शिकार जातियों को संयुक्त प्रतिरोध करने से रोका बल्कि इसने जाति व्यवस्था के चिरस्थायीकरण में मदद पहुँचायी।
– इसी पुस्तक से

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Description

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Sawarna Aur Awarna Ki Utpatti – Suvira Jaiswal

प्रो. सुवीरा जायसवाल ने जाति-व्यवस्था पर अपने शोधों को प्रस्तुत किया था। उन्होंने धर्म, वर्ण, जाति और जेण्डर पर उपलब्ध साक्ष्यों के आलोक में विस्तृत विमर्श करने के पश्चात उनके अन्तर्सम्बन्धों को उजागर किया है।

About the Author:

सुवीरा जायसवाल (जन्म 1934) ने 1953 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर के बाद पटना विश्वविद्यालय से 1963 में वैष्णव धर्म की उत्पत्ति तथा विकास विषय पर शोध पूरा किया। उनका यह शोध-प्रबन्ध 1967 में प्रकाशित हुआ जो एक मील का पत्थर प्रमाणित हुआ।

Additional information

ISBN

9.7894E+12

Author

Suvira Jaiswal

Binding

Paperback

Pages

264

Publication date

25-02-2023

Imprint

Setu Prakashan

Language

Hindi

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