DHOOP KE BAND DARWAZE (Poems) by Shalini Singh
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धूप के बन्द दरवाज़े – शालिनी सिंह
शालिनी जी का यह पहला कविता संग्रह है। पहली कृति के बारे में यह कहा जाता है कि वह एक दीर्घ समय से जमा अनुभवों का प्रथम अभिव्यक्ति-द्वार होता है। कथ्य वैविध्य उसकी प्रथम विशेषता होती है। शालिनी जी की कविताएँ उक्त कथन की पुष्टि करती हैं। सृष्टि को वे अपनी सहचरी बताती हैं- सूर्य, चाँद, तारे आदि जिसके उपादान हैं। यही उपादान मिलकर शालिनी जी का काव्य संसार रचते हैं। सृष्टि की इस विशालता में मनुष्य की अवस्थिति कहाँ है और उस अवस्थिति में स्त्री का अपना खित्ता कितना है? पितृसत्तात्मकता ने स्त्री-कर्तव्यों की एक प्रशस्त विचरण भूमि आवण्टित की है और अपने लिए अधिकारों की। निषेधताओं का विपुलांश उसी के हिस्से है। ये कविताएँ उन निषेधों का निषेध रचती दीखती हैं। जो पुरुष-समाज स्त्री के हँसने को उसके चरित्र से नत्थी करता है, जो कहता है, सूर्य दर्शन उसके लिए निषेध है (असूर्यपश्या); ये कविताएँ इन वर्जनाओं का विलोम रचती हैं। कवयित्री सूर्य से ही कहती हैं- “सृष्टि की समस्त स्त्रियों की आवाज़ कण्ठ में उतारते हुए आवाहन करती हूँ तुम्हारा / हे सूर्य देव तुम आओ / सात समन्दर, सात नदी, सात ताल, सात द्वार पार करने पड़ें तब भी तुम आओ / एक स्त्री की अस्थि मज्जा को तुम्हारी उतनी ही दरकार है। जितनी सृष्टि के अन्य जीवों को/ मैंने देह के सारे बन्धन खोल दिये हैं कि तुम आओ और मुझे अपनी गुनगुनी धूप के आलिंगन में भर लो।”
शालिनी जी अपनी कविताओं में प्रेम का एक व्यापक संसार रचती हैं। इसमें प्रेम-प्राप्यता, अप्राप्यता और प्रेम में छल की कृत्यताएँ शामिल हैं। प्रेम में आहत हो चेतना की कसौटी पर प्रेम परखने की परिपक्वता भी। स्त्री को बाँधने की दीर्घ परम्परा में वे पुरखों की भूमिका को याद करती हैं। उन्होंने स्त्री को देवी या लक्ष्मी का ऐसा कर्मकाण्डी जामा पहनाया कि वे अपना इंसान होना ही भूल गयीं। स्त्री को अपने जीवन की कथा दूसरों के हाथों नहीं वरन् अपनी इच्छाओं की रोशनाई से लिखनी है। पुरुष द्वारा बिछायी लिंग भेद की बिसात को वे पहचानती हैं और दुराग्रहों की उस सीमा को जताती हैं जहाँ चीज़ों को भी स्त्रीत्व का पर्याय बना दिया गया है। कटहल लघु आकार है तो वह कटहली है, आम छोटा है तो वह अमिया। ये कविताएँ पूरे वैभव के साथ स्त्री को केन्द्रीय अवस्थिति देती हैं।
कविताओं में प्रकृति की उपस्थिति इस कविता-संग्रह को वैविध्य देती है। बिम्बों और प्रतीकों ने कविताओं को निरी अभिधात्मकता से ऊपर उठाया है। यहाँ ” आसमान तारों के बिछौने के लिए सूरज को परे खिसका देता है।”
यहाँ ” पेड़ों से गिरकर पुष्प अल्पना बनाते हैं।”
इन कविताओं में अन्धविश्वासों और आस्थाओं की भगदड़ दर्ज है। ख़ुद किसान न होते हुए भी अपने पुरखे किसानों के दाय की विनत समादरता है और यह गम्भीर चिन्ता भी कि ग़रीब भिखारी हो रहे हैं और किसान मज़दूर।
स्त्री जगत् को केन्द्र में रखते हुए संग्रह की कविताएँ जीवन में सम्पूर्णता की आकांक्षा लिये हुए हैं और किसी भी कमतरी या अपूर्णता के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण लिये हुए हैं।
शालिनी जी की इस काव्यकृति का स्वागत है।
– हरीशचन्द्र पाण्डे
Description
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About The Author
शालिनी सिंह
जन्म : 30 सितम्बर, लखनऊ।
शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), एम. फ़िल, पी-एच.डी. ।
प्रकाशन : कृति बहुमत, अनुनाद, कविता बिहान, पोषम पा, जन सन्देश टाइम्स, सण्डे नवजीवन, नवभारत सतना, जनरव, नया पथ, अनहद सहित अन्य ई पत्रिकाओं
और ब्लॉग में कविताओं का प्रकाशन, हिन्दवी की ‘नयी सृष्टि नयी स्त्री 2024’ में चयनित। लखनऊ में साहित्यिक संस्था ‘सुखन चौखट’ का संचालन।

Additional information
| Writer | Shalini Singh |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| Language | Hindi |
| ISBN | 978-93-6201-189-3 |
| Pages | 128 |
| Publication date | 30-03-2026 |
| Publisher | Setu Prakashan Samuh |





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