Multah Mujhme Ek Prachchhnna Davanal Bhi Hai (Poems) by Geeta Malik
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मूलतः मुझमें एक प्रच्छन्न दावानल भी है – गीता मलिक
‘मूलतः मुझमें एक प्रच्छन्न दावानल भी है’ गीता मलिक (जो अनामिका सिंह के रूप में चर्चित रही हैं) का पहला कविता संग्रह है। इन कविताओं में उनके अन्तर की आग को महसूस किया जा सकता है। अपने स्वत्व के लिए निरन्तर यातनाओं से गुजरना, संघर्ष करना और पराजय की स्थितियों में पड़े रहकर भी हार न मानने की जिद ने ऐसी कविताओं को सिरजने की प्रेरणा दी है जिसमें हम आग की तपिश को महसूस कर सकते हैं- ‘इन दिनों इस रुके हुए दौर में/ विश्वास का चाबुक / पीठ को लहूलुहान किये है। हमारी आशाएँ जब्त कर ली गयी हैं। हमारे सपनों के पैबन्द / कटे हुए अंगों की तरह / नफरत से फेंक दिये गये हैं घने जंगल में यह जंगल भेड़ियों के झुण्ड से घिरा है। या वह फेंका हुआ तीर था/ आग में तपा हुआ सरिया/ एड़ी में छुपी हुई कोई कील थी। वह छोड़कर जाना/ उम्र की एक खोज को धत्ता बताकर ।’
गीता मलिक की कविताओं में जहाँ शिल्प का नयापन है, वहीं उनके कथ्य में स्त्री की अन्तरपुकार भी है जो अब तक अनसुनी, अनबुझी रहती आयी है- ‘वह स्त्री कई बार अर्द्धमूर्छित हुई है। कई बार लगता है उसके शोर में सुनामी का गर्भ बन गया है। कितनी दफा वह दबा लेती है अलख को घोर पीड़ा में।’ लेकिन इस यातनादायी स्थिति में भी गीता मलिक की कविताओं में उम्मीद फिर भी जीवित है और वह उम्मीद उस प्रेम पर कायम है जो हमेशा ही टूटते-बिखरते लोगों का आसरा रहा है- ‘मैं अपनी नरम देह पर/ तुम्हारी शापित बुद्धि के उद्गार/ लिखा कर लायी हूँ कि मैंने मुक्त कण्ठ से स्तुतियाँ की हैं। आराध्य की/ अपनत्व से झेले हैं प्रतिकार/ अन्ततः / मैं साध लेती हूँ। जीवन के सन्तुलन में स्वयं को जानती हूँ एक दिन प्रेम मुझे बचा लेगा/ बिखरने से !’
इस तरह हम देख सकते हैं कि गीता मलिक अपनी कविताओं से न केवल आश्वस्त करती हैं बल्कि कविता के तानेबाने को अपने कथ्य से बदलते हुए एक ऐसी दुनिया रचती हैं जो भौतिक रूप से तो उपस्थित है, पर कविताओं में ओझल ही रही है। ऐसी कविताएँ बिना अपने को दग्ध किये और बिना अतिरिक्त जोखिम के, सम्भव नहीं होतीं। यहाँ अपने दायित्व और ज़िम्मेदारी से बच निकलने का कोई चोर दरवाजा नहीं है और न ही कोई चातुर्य से ओतप्रोत कीमियागरी। देखे, जिये और झेले गये समय को कविता में निबद्ध कर अपने भीतर के दावानल से हमारा परिचय कराना सिर्फ उसकी पहचान तक सीमित नहीं है, वरन हमारे अपने अन्तस को जगाना भी है, जिसकी दाह को हम अनसुना किये रहते हैं और उसके परिणामस्वरूप यह संसार निरन्तर दग्ध होता रहता है। दूसरे शब्दों में, यह संग्रह हमारी जवाबदेही भी तय करता है और नागरिक धर्म भी अब मत लौटना कभी / उम्मीद की महीन तहों में/ छिपकर मत बैठना / लौट आने की उम्मीद / जाने के दुख पर जमा हुआ पहाड़ है।’
Description
Multah Mujhme Ek Prachchhnna Davanal Bhi Hai (Poems) by Geeta Malik
मूलतः मुझमें एक प्रच्छन्न दावानल भी है – गीता मलिक
About The Author
गीता मलिक
10 जुलाई 1982 को शामली (उत्तर प्रदेश) में जन्मीं गीता मलिक परिषदीय विद्यालय में शिक्षिका हैं।
समकालीन हिन्दी कविता के परिदृश्य में अपनी कविताओं की ताज़गी और नये भाव विन्यास के कारण चर्चा में रहीं गीता मलिक, काव्य जगत में अनामिका सिंह के रूप में जानी जाती रही हैं। यह उनका पहला कविता संग्रह है।
Additional information
| Writer | Geeta Malik |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| Language | Hindi |
| ISBN | 978-93-6201-024-7 |
| Pages | 271 |
| Publisher | Setu Prakashan Samuh |





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