Description

गान गुणगान – सत्यशील देशपांडे – अनुवाद : उषा बजाज देशपांडे

हमारे शास्त्रीय संगीत के रसिकों की कोई कमी नहीं है। नयी तकनालजी ने उसे सहज सुलभ करा के उनकी संख्या शायद कई गुना बढ़ा दी है। लेकिन सार्वजनिक परिसर में संगीत और संगीतकारों पर विचार-विश्लेषण का बहुत अभाव है। यह अभाव हिन्दी अंचल में विकराल है हालाँकि ज्यादातर घराने हिन्दी अंचल में ही उपजे और वहीं से ग़ायब हैं। संगीतकारों की आपस में चर्चा होती है, वाद-विवाद, बहस आदि भी लेकिन उसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति नहीं होती।

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के विरुद्ध – अखिलेश

स्वामीनाथन : एक पक्ष

अखिलेश ने इस किताब ‘के विरुद्ध’ में देश के विलक्षण चित्रकार और चिन्तक जगदीश स्वामीनाथन को अपनी तरह से याद किया है। उनके इस याद करने में स्वामीनाथन तो हैं ही, उनके साथ ही अनेक चित्रकार, लेखक आदि ने भी इस किताब में अपनी जगह बनायी है। इन पन्नों में स्वामीनाथन और अन्यों के जीवन्त चित्र तो हैं ही पर साथ ही जगह-जगह अखिलेश ने उनके चित्रों का अपनी तरह से पर्याप्त विश्लेषण भी किया है। आप लक्ष्य करेंगे और स्वयं अखिलेश ने भी इस ओर इशारा किया है कि ‘के विरुद्ध’ को महात्मा गांधी के बीज-ग्रन्थ ‘हिन्द स्वराज’ में अपनायी गयी शैली में लिखा गया है। जब मैं इस स्मृति ग्रन्थ में इस शैली के औचित्य के विषय में सोच रहा था तो मुझे लगा कि सम्भवतः यह शैली इस बात का संकेत है कि जगदीश स्वामीनाथन जैसे जटिल कलाकार और चिन्तक को समझने के लिए अनेक तरह के मार्ग लेना आवश्यक है। उसके बगैर उन्हें किसी भी हद तक समझ पाना और उनकी कला व चिन्तन को अपने समय के लिए उपलब्ध करा पाना मुमकिन नहीं है। स्वामीनाथन को जानने के अनेक रास्ते खोजने होंगे। अखिलेश की खोज उन्हें अगर ‘हिन्द स्वराज’ की शैली तक ले गयी है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। वे निश्चय ही स्वामीनाथन जैसे विलक्षण लेकिन जटिल व्यक्तित्व को समझने की ख़ातिर दूसरे रास्तों को छोड़ इस रास्ते पर आए हैं।

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वा घर सबसे न्यारा – ध्रुव शुक्ल

हिन्दी कवि कथाकार ध्रुव शुक्ल ने जो प्रयत्न किया है, वह मूल्यवान् और कुमार जी के बारे में अब तक जो लिखा-समझा गया है, उसमें कुछ नया, रोचक और सार्थक जोड़ता है। इस जीवनी में कुमार जी के बारे में जो पहले से जाना हुआ है उसे, जो कम या बिलकुल भी नहीं जाना हुआ है, उसे निरन्तरता में जोड़कर एक ऐसा जीवन वितान चित्रित हुआ है जिसमें कुमार जी के संघर्ष, सौन्दर्य-बोध, हर्ष और विषाद, विफलताएँ और रसिकता सभी गुँथे हुए हैं। भौतिक समय और संगीत – समय की तात्कालिकता, परम्परा के उत्खनन और नवाचार के जोखिम आदि की बहुत रोचक व्याख्याएँ यथास्थान बड़े मार्मिक ढंग से उभरती हैं । कुमार गन्धर्व की जीवन-कथा संघर्ष और लालित्य की कथा एकसाथ है—उसमें भारतीय आधुनिकता की अपनी मर्मकथा भी अन्तर्भूत है। ध्रुव शुक्ल ने यह जीवनी संवेदना, समझ और भाषा में काव्यात्मक अनुगूँजें उद्दीप्त करते हुए बहुत मनोयोग से लिखी है।

Additional information

Language

Hindi

Publisher

Setu Prakashan Samuh

Binding

Paperback

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