Description

अनुराग कविता के आँगन में दबे पाँव जाते हैं और उसे निपट वैसा ही देख पाते हैं जैसी वह अपने मूल रूप में है, बिना किसी अतिरिक्त आरोपण और बनाव-श्रृंगार के। आज के समय में जब प्रेम कविताओं के साथ ऐसा संकोची आचरण लगभग असंभव हो गया है, वह एक विरल कवि की तरह लिक्खाड़ों के मोहल्ले में अपना पहला क़दम रखते हैं। कवि के तौर पर उनका संकोच इन कविताओं में इस तरह झिलमिलाता है, जैसे संध्या आरती के दीयों की रोशनी नदी में झिलमिलाती है और पानी से टकराकर एक जगमगाते दृश्य का रचाव करती है। कठिन कविता लिखना बहुत कठिन काम नहीं है, असल चुनौती सरल कविता में कविता को बचाए रखने की है। अनुराग अपनी स्वाभाविक सहजता के साथ कविता में उस अलक्षित तरलता को सहेज पाते हैं। एक कविता-प्रेमी के तौर पर उनकी कविताओं से गुजरते हुए मुझे यह आश्वस्ति मिलती है कि ये कविताएँ जीवन की धूप में पर्याप्त सिंकी हुई हैं, मगर कहीं से भी जली हुई नहीं। कविता जिन लोगों के लिए भोजन- पानी का काम करती है, अनुराग की कविताएँ उन्हें जीवन-ऊर्जा से भरेंगी। ये रोहन की जुबान पर लंबे समय तक बने रहने वाले स्वाद की कविताएँ हैं।

– बाबुषा कोहली, कवि-गद्यकार

Additional information

Author

Anurag Vatsa

Binding

Paperback

ISBN

978-81-952549-9-6

Language

Hindi

Publication date

01-11-2023

Publisher

Rukh publications

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