Ummeed Prem ka Ann Hai
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कविताएँ पढ़ीं ज़्यादा, लिखीं कम। पढ़ते हुए अपने लिखे को बार-बार भूलता रहा। याद आने पर भी सन्देह बना रहा। इसलिए कवि-छवि से हमेशा मुक्त रहा। कविताओं की इस किताब से मुमकिन है मुक्ति का वह एहसास कुछ कम हो, लेकिन पूरी तरह जाएगा नहीं। मेरी कविताएँ ख़ामोशी में पढ़ी जानेवाली चिट्ठियाँ हैं। इनकी प्रेरणा प्रेम है। युद्ध और हत्या से सने इस समय में मेरे पास प्रेम से भिन्न कहने को कुछ नहीं।
– अनुराग वत्स
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Description
अनुराग कविता के आँगन में दबे पाँव जाते हैं और उसे निपट वैसा ही देख पाते हैं जैसी वह अपने मूल रूप में है, बिना किसी अतिरिक्त आरोपण और बनाव-श्रृंगार के। आज के समय में जब प्रेम कविताओं के साथ ऐसा संकोची आचरण लगभग असंभव हो गया है, वह एक विरल कवि की तरह लिक्खाड़ों के मोहल्ले में अपना पहला क़दम रखते हैं। कवि के तौर पर उनका संकोच इन कविताओं में इस तरह झिलमिलाता है, जैसे संध्या आरती के दीयों की रोशनी नदी में झिलमिलाती है और पानी से टकराकर एक जगमगाते दृश्य का रचाव करती है। कठिन कविता लिखना बहुत कठिन काम नहीं है, असल चुनौती सरल कविता में कविता को बचाए रखने की है। अनुराग अपनी स्वाभाविक सहजता के साथ कविता में उस अलक्षित तरलता को सहेज पाते हैं। एक कविता-प्रेमी के तौर पर उनकी कविताओं से गुजरते हुए मुझे यह आश्वस्ति मिलती है कि ये कविताएँ जीवन की धूप में पर्याप्त सिंकी हुई हैं, मगर कहीं से भी जली हुई नहीं। कविता जिन लोगों के लिए भोजन- पानी का काम करती है, अनुराग की कविताएँ उन्हें जीवन-ऊर्जा से भरेंगी। ये रोहन की जुबान पर लंबे समय तक बने रहने वाले स्वाद की कविताएँ हैं।
– बाबुषा कोहली, कवि-गद्यकार
Additional information
| Author | Anurag Vatsa |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | 978-81-952549-9-6 |
| Language | Hindi |
| Publication date | 01-11-2023 |
| Publisher | Rukh publications |


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