Sale!

GEELI MITTI PAR PANJON KE NISHAN By Farid Khan

Original price was: ₹260.00.Current price is: ₹195.00.

🎉 You Save 25%

यह एक चकित करने वाला तथ्य है कि हिन्दी कविता में प्रस्थान बिन्दु या पैराडाइम शिफ्ट हमेशा हाशिये में प्रकट होने वाली आकस्मिक कविताओं के द्वारा हुआ है। चाहे मुक्तिबोध की कविता अँधेरे में, राजकमल चौधरी की कविता मुक्ति प्रसंग, धूमिल की पटकथा, सौमित्र मोहन की लुकमान अली, आलोकधन्वा की गोली दागो पोस्टर आदि

गीली मिट्टी पर पंजों के निशान लेखक Farid Khan की एक मार्मिक और विचारोत्तेजक कृति है, जो जीवन की नमी, यादों की छाप और रिश्तों की जटिलताओं को बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है।

यह पुस्तक उन अनकहे एहसासों की कहानी है, जो समय के साथ मिटते नहीं बल्कि और गहरे होते जाते हैं—ठीक वैसे ही जैसे गीली मिट्टी पर बने निशान।

लेखक ने सरल भाषा में गहरे भावों को पिरोया है, जो पाठक को हर पन्ने पर जोड़कर रखता है और सोचने पर मजबूर करता है।

👉 अगर आप भावनात्मक और यथार्थवादी साहित्य पसंद करते हैं, तो यह किताब आपके लिए एक बेहतरीन चुनाव है।

In stock

SKU: geeli-mitti-par-panjon-ke-nishan Category:

Description

यह एक चकित करने वाला तथ्य है कि हिन्दी कविता में प्रस्थान बिन्दु या पैराडाइम शिफ्ट हमेशा हाशिये में प्रकट होने वाली आकस्मिक कविताओं के द्वारा हुआ है। चाहे मुक्तिबोध की कविता अँधेरे में, राजकमल चौधरी की कविता मुक्ति प्रसंग, धूमिल की पटकथा, सौमित्र मोहन की लुकमान अली, आलोकधन्वा की गोली दागो पोस्टर आदि कविताएँ हाशिये में अचानक कौंधने वाली ऐसी कविताएँ थीं, जिन्होंने मुख्यधारा की तत्कालीन स्वीकृत कविताओं की दिशा बदल दी। फ़रीद की कविता एक और बाघ ऐसी ही अकस्मात् कविता थी, जिसने एक दशक पहले, अँधेरे में किसी कंदील की तरह मेरा ध्यान खींचा था। इस कविता को पढ़कर मेरे प्रिय और अँग्रेज़ी के विख्यात लेखक अमिताव कुमार ने टिप्पणी की थी कि बाघ कविता के पोस्टर्स छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के जंगलों के हर पेड़ पर टाँग देना चाहिए। जिससे लोग समझ सकें अपने समय की सच्चाइयाँ… कि उन्हें भी अब संग्रहालय या चिड़ियाघरों में रखने की परियोजना ज़ोरों से चल रही है! यह कविता जब आयी थी तब छत्तीसगढ़ में सलवाजुडूम चल रहा था, फ़िल्म कांतारा में जिसकी परिणति दिखाई पड़ती है, यह उसी मार्मिकता की कविता है। इसके बाघ की आँखों में हरियाली का स्वप्न है जिसे चारों तरफ़ से घेरकर मारा जाता है। असल में कविता ने फ़ासिज्म की आहट को भी पहचाना था। इस सन्दर्भ में यह कविता अपनी अर्थव्यापकता में बहुत दूर तक जाती है।

About the Author:

फ़रीद ख़ाँ जन्म : 29 जनवरी 1975 पटना में पले-बढ़े। पटना विश्वविद्यालय से उर्दू में एम.ए., पटना इप्टा से वर्षों तक जुड़ाव । भारतेन्दु नाट्य अकादमी, लखनऊ से नाट्य-कला में दो वर्षीय (1998-2000) प्रशिक्षण । फिलहाल मुम्बई में कथा-पटकथा लेखन में सक्रिय ।

Additional information

ISBN

9.7894E+12

Author

Farid Khan

Binding

Paperback

Pages

144

Publication date

25-02-2023

Imprint

Setu Prakashan

Language

Hindi

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “GEELI MITTI PAR PANJON KE NISHAN By Farid Khan”

Your email address will not be published. Required fields are marked *


You may also like…