Katl Gair Iradtan By Raju Sharma
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Katl Gair Iradtan By Raju Sharma
क़त्ल गैर इरादतन’ राजू शर्मा का चौथा उपन्यास है। यह क़त्ल गैर इरादतन है। किसकी? ज़ारा अफ़रोज़ की-पर इस हत्या के संदर्भ में नैरेटर कहता है कि इसके बाद ज़ारा अफ़रोज़ हत्या केस में क्या हुआ—वह इस कथा का विषय नहीं है और भौतिक रूप में हत्या भी एक यही हुई है किंतु वास्तव में यहाँ हत्या की श्रृंखलाएँ हैं।
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Description
क़त्ल गैर इरादतन’ राजू शर्मा का चौथा उपन्यास है। यह क़त्ल गैर इरादतन है। किसकी? ज़ारा अफ़रोज़ की-पर इस हत्या के संदर्भ में नैरेटर कहता है कि इसके बाद ज़ारा अफ़रोज़ हत्या केस में क्या हुआ—वह इस कथा का विषय नहीं है और भौतिक रूप में हत्या भी एक यही हुई है किंतु वास्तव में यहाँ हत्या की श्रृंखलाएँ हैं। न्याय की हत्या, संवेदना की हत्या, मनुष्य के कोमल भावों की हत्या, व्यवस्था की हत्या और सबसे ऊपर मनुष्य होने के भाव की हत्या…जिस रूप में जारा की भौतिक हत्या होती है अनचाहे और अनजाने-व्यवस्था और समाज भी उसी तरह अपने नागरिकों द्वारा रोज और निंरतर मारा जा रहा है। उपन्यासकार के रूप में हत्या जैसे विषय से जिन व्यापक सामाजिक संदर्भो को राजू शर्मा ने उठाया है, वह उनकी औपन्यासिक क्षमता का प्रस्त्रोता तो है, इस उपन्यास का वैशिष्ट्य भी है। ये हत्याएँ, आखिर तक ठोस रूप में हत्या बनी रहती हैं, यह उपन्यास की सिद्धि है। यह इसलिए, क्योंकि उपन्यास में तो पात्र-एसपी, पायल, कांत, मिकी, डीएम हत्या करते हैं और व्यवस्था के बरअक्स हत्या ही तर्कसंगत लगती है। इसकी संगति टूटती है उस अंत:सलिला से, जो उपन्यासकार चुपचाप टाँकता चलता है। यह मनुष्यता का पक्ष है। मनुष्य होने का भाव है। वत्स जी का होना, अफ़रोज़ बहनों का होना इस कातिल व्यवस्था के समक्ष कमजोर ही सही पर मनुष्य की, मनुष्यता की उपस्थिति है। उपन्यास मध्य वर्ग के महत्त्वाकांक्षाओं का परिणाम है, जिसमें उसका होना ही सब कुछ है। उसकी भवता, उसकी सिद्धि, उसकी निरंतर प्रगति ही उसका एकमात्र लक्ष्य है। अब मध्य वर्ग व्यवस्था और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी चाहता है। वह परंपरागत मध्य वर्ग की तरह अपनी निष्ठाओं और अपने आदर्शों से चिपका नहीं है। यह भी हत्या का एक रूप है। पर मध्यवर्गीय आदर्श में जो भटकाव हुआ और उसमें जो नयी महत्त्वाकांक्षाएँ उपन्न हुईं, उसने समाज की आधारभूत संरचना में बदलाव उत्पन्न किया। एक मूल्य के रूप में या एक हत्या के रूप में यह पूरा उपन्यास इस बदलाव और महत्त्वाकांक्षा को रेखांकित करता है। कांत का एक संवेदनशील से क्रूर व्यक्तित्व में रूपांतरण, पायल और कांत तथा एसपी आदि का अपनी सुविधा के अनुसार गलत तथ्य सही मानना या मुद्दे और सामाजिक के अनुसार आचरण का बदलना-ये इसी कारण हैं। पायल झूठ स्वीकार करने के लिए तैयार बैठी थी, केवल उसे तर्क की बैशाखी चाहिए थी, कांत मुहैया कराता है। इस उपन्यास में उठाये गये विषय और उनके साथ जो ट्रीटमेंट लेखक ने किया है, उसमें लेखक की भाषा बहुत महत्त्वपूर्ण है। भाषा प्रांजल तो है ही, साथ ही वह शहरी कामकाजी मध्य वर्ग की भाषा का जीवंत नमूना है। मध्यवर्गीय चेतना की संप्रेषण योग्य भाषा ही इसकी सबसे बड़ी खूबी है। इसमें उर्दू और अंग्रेजी के शब्द आसानी से घुले-मिले हैं। साथ ही घटनाओं की बुनावट भी इसमें बहुत कुशल और सूक्ष्म है।
About the Author:
जन्म : 1959 शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से भौतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर। लोक प्रशासन में पी-एच.डी.। 1982 से 2010 तक आईएएस सेवा में रहे। उसके बाद से स्वतंत्र लेखन, मुसाफ़रत और यदा-कदा की सलाहनवीसी। लेखन के अलावा रंगकर्म, फ़िल्म व फ़िल्म स्क्रिप्ट लेखन में विशेष रुचि। प्रकाशन : हलफनामे, विसर्जन, पीर नवाज़, क़त्ल ग़ैर इरादतन (उपन्यास); शब्दों का खाकरोब, समय के शरणार्थी, नहर में बहती लाशें (कहानीसंग्रह); भुवनपति, मध्यमवर्ग का आत्मनिवेदन या गुब्बारों की रूहानी उड़ान, जंगलवश (नाटक)। अनेक नाटकों का अनुवाद व रूपांतरण पिता(ऑगस्त स्ट्रिनबर्ग)।
Additional information
| ISBN | 9.78939E+12 |
|---|---|
| Author | Raju Sharma |
| Binding | Hardcover |
| Pages | 352 |
| Publisher | Setu Prakashan Samuh |
| Imprint | Setu Prakashan |
| Language | Hindi |
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