Description

About the Author

तसलीमा नसरीन का जीवन संघर्षों का एक अनन्त सिलसिला है और उनका साहित्य उन तमाम संघर्षों की एक अन्तहीन दास्तान। अपने लेखन के जरिये उन्होंने संघर्ष, विद्रोह और मुक्ति की पुकार को एकाकार कर दिया है। जीवन में जो कुछ भी वर्जित, घृणित और उपेक्षित है, तसलीमा अपने साहित्य में उन सबको एक उदात्त आयाम देकर प्रस्तुत करती हैं। तसलीमा को पढने के बाद पाठक अपने आप को एक वीभत्स यथार्थ के सामने पाता है और उसका नजरिया बदलने लगता है। तसलीमा फेमिनिज्म के बने-बनाए ढाँचों को तोड़कर हमारे सामने उसका एक अलग पाठ प्रस्तुत करती हैं। तसलीमा के समूचे कथा-साहित्य और आत्मकथा-साहित्य में एक आवेग है और एक त्वरा है। चाहे वह ‘लज्जा’ हो, ‘फेरा’ हो, ‘मेरे बचपन के दिन’, ‘उत्ताल हवा’ या ‘द्विखंडित’ हो। तसलीमा औरत के हक़ में कुछ गद्य, कुछ पद्य भी लिखती हैं और कहती हैं कि ‘औरत का कोई देश नहीं’ होता। तसलीमा का लेखन एक हमेशा धधकते रहने वाली एक मशाल की तरह है जिसकी चिंगारियाँ स्त्री-मुक्ति की राहों को रौशन करती रहती हैं।

Additional information

Author

Taslima Nasrin

Binding

Paperback

ISBN

978-9352291830

Language

Hindi

Pages

184

Publication date

1 January 2011

Publisher

Vani Prakashan

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